सोमवार, २४ ऑगस्ट, २०२०

नारी वेदना को मानवीयता से देखने की दृष्टि देनेवाला उपन्यास ‘इब्नेबतूती’

                     

भारत की पुरुष प्रधान संस्कृति में स्त्रियों को दोयम स्थान दिया जाता रहा है, उसे उपेक्षित रखा जाता रहा है। तो भारतीय साहित्य में ऐसी उपेक्षित स्त्रियों की वेदनाओं, पीड़ाओं तथा उनकी भावनाओं को मानवता की दृष्टी से देखकर अभिव्यक्त करने की कोशिश भी होती रही है। लेकिन फिर भी नारी जीवन के कुछ अनछुए पहलू लेखकों की लेखनी से शब्दबध्द नहीं हुएं है। ऐसे अनछुए पहलू की दास्तान है ‘इब्नेबतूती’ उपन्यास। यह उपन्यास नई हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक दिव्य प्रकाश दुबे जी ने लिखा है और जिसका प्रकाशन हिंद युग्म द्वारा जुलाई, 2020 में हुआ है। इस उपन्यास में प्रमुख पात्र के रूप में शालू अवस्थी है। जो एक आत्मनिर्भर नारी है और कृषि विभाग में एडिशनल डायरेक्टर के पद पर कार्यरत है। अपने पति की असामयिक मृत्यु के उपरांत भी न हारते हुए अपने बेटे को लेकर बड़े स्वाभिमान से, प्रामाणिकता से मातृत्व का निर्वहन करते हुए रहने वाली एक आदर्श भारतीय नारी है। उसे एक राघव नामक लड़का है, जो कॉलेज की पढ़ाई कर रहा है। डाटा साइंस में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के लिए वह विदेश जाना चाहता है। उसका चयन भी होता है लेकिन उसके सामने दिक्कत यह है कि वह अपनी मां अर्थात शालू को अकेली छोड़कर जाना उसे ठीक नहीं लगता । इसलिए वह चिंतित है। उसकी एक गर्लफ्रेंड है  जिसका नाम निशा है।  

 घर में अलमारी के ऊपर रखा हुआ पुराना संदूक है। उस पुराने संदूक को खोलने की परमिशन किसी को भी नहीं थी। क्योंकि शालू ने बचपन से ही बेटे राघव को बताया था कि उस संदूक को हाथ न लगाए, ना ही वह खोल कर देखें। क्योंकि उसमें उसके पापा के हॉस्पिटल के कागजात है। इसीलिए राघव के मन में उस संदूक को लेकर एक जिज्ञासा भी थी। लेकिन मां ने दी हुई सूचना के कारण वह उस संदूक को ना कभी हाथ लगाता या न ही खोलता था । राघव की गर्लफ्रेंड निशा एक दिन उस संदूक को खोलकर उसमें की चिट्ठियां पढ़ लेती हैं। फिर राघव और निशा के बीच उन चिट्ठियों को लेकर चर्चा होती है। उन चिट्ठियों से उनको यह पता चलता है कि कुमार आलोक नामक कोई व्यक्ति है, जिसको संबोधित करके चिट्ठियां लिखी गई है। फिर वह दोनों शालू को इस बारे में पूछते हैं। शालू का अतीत जानने की कोशिश करते हैं। प्रारंभ में शालू यह बताती नहीं। लेकिन धीरे-धीरे अपने पुत्र हट्ट के कारण वह उसे  कुमार आलोक के बारे में बताती है। राघव और निशा शालू की अपनी भावनाओं, विचारों को व्यक्त करने के लिए किसी पार्टनर की, किसी फ्रेंड की जरूरत को महसूस करते हैं और उसे दूसरी शादी या फ्रेंड करने की सलाह देते हैं,उनसे चर्चा करते हैं। प्रारंभ में शालू मानती नहीं है। लेकिन बाद में वह मानती है। निशा शालू के लिए मेट्रोमोनी में एक विज्ञापन देती है। और फिर मेट्रोमोनी के माध्यम से एक प्रोफेसर शालू को मिलते हैं। दोनों में चर्चा होती है। दोनों में फ्रेंडशिप भी हो जाती है। लेकिन तब तक शालू ने कुमार आलोक के बारे में बेटे राघव और निशा को इतिहास बताती है। फिर राघव कुमार आलोक को ढूंढने की कोशिश करता है। गूगल पर सर्च करता है। और फिर उसके हाथ एक पता लगता है वह अपनी मां को लेकर उस पते पर जाता है। लेकिन वहां पर जिस कुमार आलोक को ढूंढ रहे थे वे कुमार आलोक ना होकर दूसरे कुमार आलोक निकलते है। फिर भी राघव कुमार आलोक को ढूंढता ही रहता है। राघव की कुमार आलोक की खोज शुरू रहती है और फिर वह शालू को लेकर बोधगया में जाता है। वहां उनको कुमार आलोक के व्रुद्ध पिता मिलते है। लेकिन वे भी कहते हैं कि कुमार आलोक से हमारा झगड़ा हो गया है, वह हम पर नाराज है। वह गांव में आता नहीं है। उनसे एक मोबाइल नंबर मिलता है, जो पुत्तन भैया नामक व्यक्ति का है, जो कुमार आलोक का दोस्त है । फिर उस नंबर को राघव कॉल करता हैं, वहां अपनी मां को लेकर जाता हैं लेकिन वहां पर भी उनकी भेंट, मुलाकात नहीं होती है। नाराज होकर अपनी मां को लेकर घर आता है। और अंत में दिल्ली को एयरपोर्ट जाने के लिए निकलता है। उसे छोडने के लिये शालू, निशा और प्रोफेसर साथ में आते है  वे दोनो जब पुत्तन भैया के वहा एक रात रहे थे, तब उसी रात शालू ने एक चिठ्ठी लिख कर वहा रखी थी।  वह कुमार आलोक के हाथ लगती है। फिर अंत में कुमार आलोक और शालू की एयरपोर्ट पर भेंट होती है और उपन्यास की कथावस्तु यहां  समाप्त होता है। 

उपन्यास के प्रारंभ में ही ‘इब्नेबतूती’ इस शब्द का मतलब देते हुए लेखक ने लिखा है "अधूरी चीजों, चिट्ठियों, बातों, मुलाकातों, भावनाओं, विचारों, लोगों के नाम एक नया शब्द गढना पड़ा -इब्नबतूती"। उपन्यास के प्रारंभ में समर्पण की जो पंक्ति है- 'मां जो कभी एक 20 बरस की लड़की थी उस लड़की के नाम' यह पढ़कर पाठक उपन्यास की कथावस्तु का अनुमान लगाता है कि शायद यह उपन्यास मां और उसकी अपनी अतीत के दुनिया पर आधारित उपन्यास है।

उपन्यास में छोटे-छोटे 33 भाग है। हर एक भाग को शीर्षक दिए गए हैं। जैसे- अक्टूबर 2015, 3 महीने पहले, अम्मा यार, रुमाल, संदूक, 7 अगस्त 1990, फौजी दा ढाबा आदि। जिसके कारण पाठक को कथावस्तु समझने में मदद हुई है। इन कुछ भागों के पहले कुमार आलोक या शालू की चिट्ठीयों को प्रस्तुत किया गया है। जिसमें तरल भावनाएं है तथा अनूठी विचार भी है। जैसे "पूरी दुनिया में एक भी डॉक्टर ऐसा नहीं है, जो दवा के साथ दिन में दो बार प्रेम पत्र लिखने के लिए कहे। सब बीमारियां केवल दवा से कहा ठीक होती है !" (पृष्ठ 44)  उपन्यास में बीच-बीच में कुछ ऐसे उद्धरण है, वाक्य है जो हमें सोचने के लिए बाध्य करते हैं। जैसे "अक्सर होता है न कि जहां के लिए हम चले थे वहां पहुंचते ही याद आता है कि पहुंचने की वजह खो चुकी है"(पृष्ठ 16) इसके साथ-साथ उपन्यास में कृषि विभाग के दफ्तर की कार्यशैली तथा वहां के कुछ यादव जैसे अफसरों की, कर्मचारी लोगों की स्त्रियों तरफ देखने की प्रवृत्ति का चित्रण भी हुआ है।  इन प्रवृत्तियों के संदर्भ में लेखक लिखते है कि “वैसे भी लड़कियां और औरतें अपने आसपास एक लाइन खींच कर चलती है। उनको खूब समझ में आता है कि कौन लाइन क्रॉस कर रहा है और उसको ठीक कैसे करना है"(पृष्ठ 24) लेखक की जीवनानुभव, चिंतन सहजता से व्यक्त करने की शैली विशेष है। वह कहते है,  “सूखी हुई नदी की एक बहती हुई नदी की असली कहानी जानती है " (पृष्ठ 35) और एक उदाहरण हम देख सकते है "आदमी सबसे जरूरी बात सबसे पहले भूल जाता है सांस लेना सबसे जरूरी आदत है और हमें दिन में एक बार भी ख्याल भी नहीं आता कि हम सांस ले भी रहे हैं या नहीं मां का प्यार एक अदना सी सांस जैसा ही होता है"(पृष्ठ 67) इस प्रकार ऐसे अनेक वाक्य हमें नई दृष्टि देते हैं।

यह उपन्यास एक नारी के अतीत में जो भी घटनाएं घटित हुई होती है उनको अभिव्यक्त करता है। पाठकों में प्रारंभ मी बनी जिज्ञासा,रोचकता अंत तक  बनी रहती है। पाठक उपन्यास में तल्लीन हो जाता है। राघव अपना 'पुरूषी इगो' छोड़कर अपनी मां की अतीत की ओर मानवता की दृष्टि से, व्यापकता से देखता है। उसकी मानसिकता को समझने की कोशिश करता है। यह बात बहुत महत्वपूर्ण है। उपन्यास में मंडल कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद की परिस्थिति को प्रस्तुत किया गया है। अंत में उसके संदर्भ भी दिये हुए हैं।पात्रानुकूल भाषा का प्रयोग हुआ है। बीसवीं सदी के अंतिम दशक से लेकर 2015 तक की परिस्थिति का चित्रण प्रमुखता से इसमें हुआ है। अंग्रेजी शब्दों का भी बीच-बीच में इस्तेमाल हो चुका है। उपन्यास के अंत में लेखक ने पाठकों से कुछ सवाल किए हैं जो अहम है। जिससे पाठक चिंतन करने बाध्य होता है। आज भी हमारे भारत में अनेक 'शालू अवस्थी' मौजूद है जो अपने दर्द को लेकर कराह रही है। इस प्रकार नारी के ऐसे अनदेखे एवं महत्वपूर्ण पहलु को लेकर, विषय को लेकर लिखा गया यह उपन्यास अपने आप में अनूठा है और महत्वपूर्ण भी। भारतीय नारी के भीतर छिपी औरत को टटोलने का यह प्रयास प्रामाणिक भी है और प्रशंसनीय भी।

                                                                                                    -प्रा.एस.के.आतार



           

पुस्तक: इब्नेबतूती( उपन्यास)

लेखक: दिव्या प्रकाश दुबे

प्रकाशक हिंद युग्म

मूल्य: ₹150

पृष्ठ संख्या: 160










शनिवार, १ ऑगस्ट, २०२०

मुंशी प्रेमचंद यांच्या साहित्याची प्रासंगिकता

(मुंशी प्रेमचंद यांच्या जयंती निमित्त लेख)                                       





भारतीय साहित्यातील ज्या लेखकांनी विश्व साहित्याला प्रभावित केले आहे अशा मोजक्या साहित्यिकांमध्ये हिंदी साहित्याचे महान लेखक मुंशी प्रेमचंद यांचे नाव अग्रक्रमाने येते. प्रेमचंद्र हिंदी साहित्यातील वास्तववादी लेखन करणारे पहिले साहित्यकार होते. त्यांचा जन्म 31 जुलै, 1880 रोजी झाला त्यांना एकूण 56 वर्षांचे आयुष्य लाभले होते. त्यात त्यांनी पंधरा कादंबऱ्या,तीनशेपेक्षा जास्त कथा, तीन नाटके, सात बालसाहित्याची पुस्तके तसेच हजारो पानांचे संपादन इ. केले. प्रेमचंद यांच्या जीवन व साहित्याला समजून घेण्यासाठी तत्कालीन सामाजिक, राजकीय, साहित्यिक, आर्थिक इ. परिस्थिती समजून घेणे आवश्यक ठरते. प्रेमचंद यांच्या काळात भारतात इंग्रज राजवट होती अर्थात भारत पारतंत्र्य अवस्थेत होता. त्याचबरोबर सामाजिकदृष्ट्या दूषित वातावरण होते. साहित्याच्या दृष्टीने विचार करावयाचा झाल्यास त्या काळात हिंदी चे इतर लेखक राजा-राणी, रहस्यमयी, रोमांचकारी,काल्पनिक साहित्य लेखन करत होते अर्थात साहित्यात वास्तवापेक्षा काल्पनिक लेखन करण्यावर अधिक भर होता.प्रेमचंद यांनी भूतकाळातील गौरवगाण व भविष्यातील स्वप्नरंजन टाळून वर्तमानातील वास्तव आपल्या साहित्याच्या माध्यमातून व्यक्त करण्याचा प्रयत्न केला. ते म्हणतात, "वर्तमान ही सबकुछ है. यदि हम भविष्य की चिंता करते हैं, तो यह हमें कायर बना देती है और यदि भूत का भार उठाते हैं, तो यह हमारी कमर तोड़ देती है" प्रेमचंद यांनी त्याकाळी इंग्रजी सत्तेच्या विरुद्ध जाऊन देशप्रेमाने ओतप्रोत असलेला 'सोजेवतन' नावाचा ग्रंथ उर्दूमध्ये लिहिला. तो ग्रंथ इंग्रजांनी तात्काळ जप्त केला आणि त्याच्या प्रती जाळल्या. प्रेमचंद यांनी महात्मा गांधी यांच्या विचारांनी प्रेरित होऊन आपली नोकरी सोडली आणि स्वातंत्र्याच्या चळवळीत सामील झाले त्याचबरोबर नैतिक मूल्यांची आपल्या स्वतःच्या आयुष्यात जपणूक करत साहित्यामधून समता, बंधुता, एकता इत्यादी मूल्यांचा प्रचार व प्रसार केला. स्वतः एका बालविधवेशी विवाह करून एक आदर्श घालून दिला. प्रेमचंद यांनी आपल्या साहित्यातून  समाजातील उपेक्षित, वंचित, गरीब, कष्टकरी, शेतकरी, दलित, स्त्री इत्यादी वंचित वर्गाच्या समस्यांचे चित्रण केले. त्यांच्या वेदनांना, दुःखांना, त्यांच्यावर होणाऱ्या अन्यायाला आपल्या लेखनाच्या माध्यमातून वाचा फोडली. त्याचबरोबर त्यांनी आपल्या लेखनात हिंदू-मुस्लिम ऐक्य, सांप्रदायिक सद्भाव इत्यादी गोष्टींनाही स्थान दिले.
        स्वातंत्र्यपूर्व कालखंडामध्ये भारतातील समाजव्यवस्था, जमीनदारी प्रथा, औद्योगिकीकरण इत्यादी गोष्टींचा समाज जीवनावर झालेला परिणाम प्रेमचंद यांच्या साहित्यात दिसून येतो. त्यांनी आपल्या साहित्यामध्ये भ्रष्टाचार, जमीनदारी, कर्जखोरी, गरीबी,सांप्रदायिकता इत्यादी विषयावर लेखन केले. खर्‍या अर्थाने त्यांचे साहित्य तत्कालीन समाज जीवनाचा व मानवी प्रवृत्तींचे  वास्तविक प्रतिबिंब आहे तसेच ते  वास्तवावर आधारित असल्याने कालातीत आहे.प्रेमचंद यांची ‘गोदान’ नावाची कादंबरी विश्व साहित्यातील एक अप्रतिम साहित्यकृती ठरली. त्यामध्ये भारतीय शेतकऱ्यांच्या वेदनांना, समस्यांना अभिव्यक्त केले गेलेले आहे. या कादंबरीचे वर्णन ‘किसान जीवन का महाकाव्य’ म्हणून ही केले जाते. त्याचबरोबर प्रेमचंद यांनी समाजातील सर्वसामान्य व्यक्तीला आपल्या साहित्यातील प्रमुख पात्रांच्या रूपात चित्रित केले . प्रेमचंद यांनी साध्या, सरळ कथेतून समाजाला मोलाचा संदेश दिला.
प्रेमचंद यांचे साहित्य भारतातील सर्व व जगातील ही अधिकांश भाषांमध्ये भाषांतरित झालेले आहे. तसेच त्यांच्या कथा-कादंबऱ्यावर आधारित काही फिल्म, टीव्ही धारावाईक निर्माण झाल्या ज्यामध्ये शतरंज के खिलाडी,सद्गति, गोदान,गबन इत्यादी फिल्म बनविल्या गेल्या. तर गुलजार यांनी ‘तहरीर मुन्शी प्रेमचंद’ की या शीर्षकाने काही कथा निर्देशीत केल्या. ज्यांना आज युट्युब वर लाखो जणांनी बघितले आहे, आपणही बघू, ऐकू  शकतो. त्याचबरोबर माहिती तंत्रज्ञानाच्या या  युगामध्ये युट्युब सारख्या माध्यमावर ‘कहानी सुनो’ या चॅनेलवर प्रेमचंद यांच्या कथांचे समीर गोस्वामी यांच्या आवाजात रेकॉर्डिंग करण्यात आलेले आहे त्याही आपणासाठी उपलब्ध आहेत .तसेच अनेक वेबसाईटवर,पीडीएफ,आडिओ स्वरूपात प्रेमचंद यांच्या लेखनाचा संग्रह आपण इंटरनेटवर बघू ,ऐकू, वाचू शकतो.
            प्रेमचंद एका साहित्यिक युगाचे प्रवर्तक आहेत . त्यांच्या  साहित्याने समाजाला एक दिशा देण्याचे तसेच तत्कालीन  जनतेमध्ये देशप्रेमाची भावना निर्माण करण्याचे महत्वाचे कार्य केले. जातिभेद, अंधश्रद्धा, धर्मांधता, चुकीच्या रूढी परंपरा इत्यादी गोष्टींवर त्यांनी आपल्या लेखनातून कठोर प्रहार केला. आपल्या लेखणीतून धार्मिक, सामाजिक आणि संस्कृती शोषणाविरुद्ध त्यांनी नेहमी आवाज उठवला.  शोषितांचे जग साहित्याच्या माध्यमातून समाजासमोर आणले. आज काही अंशी प्रेमचंद काळाच्या तुलनेत परिस्थिती बदलली असली तरी सामाजिक, आर्थिक समस्या आपल्या समोर आ वासून उभ्या आहेत. शेतकरी, कष्टकरी, दलित इत्यादींचे प्रश्न आहेत. आज खऱ्या अर्थाने प्रेमचंद यांच्या विचारांची, साहित्याची समाजाच्या विकासासाठी खूप आवश्यकता आहे असे वाटते. आजच्या कोरोना महामारीच्या कालखंडामध्ये मानव जातीवर आलेल्या संकटाचा मुकाबला करण्यासाठी जात, पंथ, धर्म,वर्ग,वर्ण इत्यादी सर्व भेदभाव विसरून एकजुटीने या महामारीचा मुकाबला करणे खूप आवश्यक आहे. आज 'वसुधैव कुटुम्बकम' किंवा 'हम सब एक है' चा मंत्र  उपयोगी पडू शकतो.  प्रेमचंद यांनी आपल्या साहित्यामधून समस्त मानवजातीला हाच  समतेचा, एकतेचा, बंधुत्वाचा संदेश दिलेला आहे.


शनिवार, ११ जुलै, २०२०

कामप्रेरणेचा सामाजिक धांडोळा : देहाचिये गुंती



माणसाच्या भूक आणि काम या आदिम स्वाभाविक प्रेरणा होत. समाजातील प्रत्येक व्यक्तीवर संस्कार, परंपरा, आसपासचे वातावरण, जीवनानुभव, वाचन, मनन . अनेक गोष्टी प्रभाव टाकतात आणि त्या अनुषंगाने त्याचे व्यक्तिमत्व घडत जात असते. त्याचबरोबर माणसाला दैनंदिन जीवन जगत असताना वेगवेगळया ताण-तणावांना सामोरे जावे लागते. प्रत्येकाचे आपले वेगवेगळया स्तरावरील प्रॉब्लेम्स असतात. मग ते कौटुंबिक, सामाजिक, लैंगिक . कुठल्याही प्रकारचे असू शकतात. अशा प्रॉब्लेम्समुळे माणूस त्रस्त होत राहतो आणि सुखाला पारका होत जातो. मग मनुष्य आपल्या अशा प्रश्नांना, समस्यांना मनामध्ये घेऊन अस्वस्थतेत जगत असतो. त्यावेळी कुठल्यातरी माध्यमातून तो गुरू, बाबांच्या संपर्कात येतो. अशा गुरूंच्या प्रवचनाचे शब्द त्याच्या कानावर पडतात आणि तो तिकडे आकर्षिला जातो. आणि मग त्याला आपल्या समस्येची सोडवणूक होणार, जीवनातील दु: कमी होणार, आपण सुखी होणार अशी आशा निर्माण होते. त्यातून तो एका विशिष्ठ निष्ठेतून, श्रध्दापूर्वक अशा गुरूंचं ऐकत राहतो, त्यांचा अनुयायी बनून राहतो, त्यांच्यासाठी आपल्या आयुष्यातील काही वर्षे खर्ची घालतो पण कालांतराने जेव्हा गुरूच्या 'कथनी और करनी' मधले अंतर, त्यांच्या आश्रमातील पडद्यामागचे वास्तव, सहका-यांचे खून, कोकेनच्या ओव्हरडोसने गुरूजींचा मॄत्यू . गोष्टी त्यांच्या लक्षात येतात आणि मग पुन्हा 'आपल्याला काय मिळाले ' यांची शहनिशा मनुष्य करतो, गुरूच्या व्यक्तिमत्वाचा तटस्थपणे आलेख मांडतो. साधारणत: असा आशय असलेली कादंबरी म्हणजे डॉ.अंजली सोमण यांची 'देहाचिये गुंती'.
 कादंबरीचे प्रमुख पात्र परम आहे. मानवी मनाचे प्रगाढ ज्ञान, विलक्षण बुध्दिमत्ता, वाचन चिंतनाच्या जोरावर आपल्या वाणीनं सगळयांना प्रभावित करणायची क्षमता असलेला सर्वगुणसंपन्न असा परम आहे. त्याचा एक प्राध्यापक ते अध्यात्मिक गुरू पर्यंतचा प्रवास सदर कादंबरीत व्यक्त होतो. तो स्वत: काही बोलत नाही इतर चार पात्रांच्या माध्यमातून त्याची व्यक्तिरेखा स्पष्ट होत जाते. त्या पात्रांमध्ये विद्या, प्रेमा, योगेश क्रांती यांचा समावेश होतो. या चार मधील पहिली विद्या जी परमच्या व्यक्तीमत्वानं प्रभावित होते. विशेषत: परमच्या वाणीनं, परमलाही विद्या आवडते. जेव्हा विद्या परमला तुला माझ्यातलं काय आवडलं? असे विचारते तेव्हा परम म्हणतो, '' विद्या, मानवी वर्तनाचं विश्लेषण करणं फार अवघड असतं. तू तेच करायला मला सांगते आहेस. एखादी भावना मनात जागी होते. ती का जागी झाली हे सांगणं फार अवघड असतं. काही कारणं भूतकाळात रूजलेली असतात काही वर्तमानात.'' या आणि अशा अनेक वाक्यांवर, त्याच्या बोलण्यावर विद्या खूप प्रभावित होते आणि ते दोघे लग्न करतात. पण काही कालावधीनंतर परम तिला छोटया मुलाला सोडून निघून जातो. नंतर परमच्या आयुष्यात प्रेमा नावाची व्यक्ती येते जी या कादंबरीतील दुसरे महत्वाचे पात्र आहे. जी आपल्या वासनांध नव-याला, सासरच्या संवेदनाहीन माणसांना, त्यांच्या बुरसटलेल्या परंपरांना कंटाळलेली असते. ती परमच्या संपर्कात येते. परमचे शिबिरातील उपदेश तिच्या कानी पडतात. तो सांगत असतो, ''तुमचा आनंद तुमच्याच हातात असतो. पण तुम्हाला तो मिळत नाही. कारण तो तुमच्या अंतर्मनात असतो. माणूस कधीच अंतर्मुख होऊन स्वत:च्या सुखाचा शोध घेत नाही. स्वत:ला काय पाहिजे आहे याचा विचार करत नाही. माणूस नावाचा हा प्राणी बहिर्मुखच. नेहमी इतरांविषयी बोलत असतो. इतरांच्या सुख दु:खातच उडया घेत असतो. स्वत:च्या सुखाचा कधी असा कसून शोध घेतो का? घेतला तरी चुकीच्या मार्गाने सुख शोधतो. त्याला वाटते, सुख म्हणजे पैसा, सुख म्हणजे बंगला, गाडी. सुख म्हणजे रेडिओ ऐकणे, सिनेमा बघणं, परीक्षा देण त्यात चांगले माक्र्स मिळविणे. पण यानं खरं सुख लाभतं का? अजिबात नाही. हे खरं सुख नाहीच. हे रस्ते म्हणजे दु:खांवर झाकण टाकण्याचा प्रयत्न. यांनी दु: नाहीसं होत नाही. काही काळ नजरेआड होतं इतकच. वर घातलेल्या झाकणाला जरा फट पडली की आतलं भळभळतं| दु: उसळी घेऊन बाहेर येतच.'' अशा परमच्या वचनांनी ती प्रभावित होते. आपल्या नव-याला मुलाला सोडून अर्थात आपला संसार सोडून परमसोबत पळून जाते. परमला साथ देते. त्याचा आश्रम उभा करण्यामध्ये संपूर्ण जबाबदारी घेते करते मग परमचा परमानंद गुरूजी होतो. पण कालांतराने परम सुनंदाला जवळ करतो. प्रेमाला दुय्यम स्थान देतो. तिला एकाकी पाडतो. शेवटी प्रेमा त्याला सोडून निघून जाते.
तिसरे पात्र योगेश जो आपल्या डॉक्टर वडिलांच्या सतत धाकानं आत्मविश्वास हरवून बसलेला असतो. अशा परिस्थितीत तो परमानंद गुरूजींच्या संपर्कात येतो, त्यांच्या शिबिरात सहभागी होतो. गुरूजी म्हणत असतात,''सत्य आणि आभास यांच्यातील गोंधळ म्हणजे जीवन. या गोंधळात आपण अडकून पडलेलो असतो. मनात संभ्रम असतात. चूक काय आणि बरोबर काय याचा निंर्णय घेता येत नसतो. असं फरफटत जाणं आणि पैसे मिळविण्यासाठी करावी लागणारी नित्यकर्म करणं म्हणजे आयुष्य'' अशा अनेक वाक्यांनी योगेशच्या जीवनाला दिशा मिळत जाते. पण आश्रमातील वास्तव गोष्टी योगेशला कळतात तो भूतकाळात जाऊन त्याचं विश्लेषण करत राहतो.
कादंबरीतील चौथे पात्र क्रांती जी लहाणपणी मामाच्या वासनेला बळी पडलेली असते. आपला प्रियकर जितूच्या आत्महत्येमुळे डिप्रेशनमध्ये गेलेली असते. ती निम्फोमॅनिअॅक, हायपर सेक्शूअल झालेली असते. ती परमानंद गुरूजींच्या संपर्कात येते. गुरूजी सांगत असतात,''तुमचं मन म्हणजे उत्साहानं उसळणारं एक कारंजं आहे. खरं नाही ना वाटत तुम्हाला हे? पण ते सत्य आहे. लहान मुलाकडे कधी बघितलंय तुम्ही? किती उत्साहात असतात. सतत खिदळत असतात. चेहयावर निरागस हास्य असतं. तुमचं मन या लहान मुलासारखंच होतं. पण ते काळवंडलं. का? तर तुमच्यासमोर प्रश्न निर्माण झाले. त्या प्रश्नांचं तुम्ही कोळयासारखं सुंदर जाळ निर्माण केलत आणि त्यात स्वत: अडकलात. अनेक दडपणं आली तुमच्यावर. अनेक दारं, अनेक वाटा बंद करायला लागल्या. काही स्वेच्छेनं, काही नाइलाजानं. गुदमरून टाकलत तुम्ही तुमचं मन. त्याला मोकळ होऊच दिलं नाही. साखळदंडानं बांधल्या गेलेल्या या मनानं कसा घेणार तुम्ही सुखाचा शोध? आनंदाच्या मार्गावरून जायचं असेल तर मन मोकळ करायला पाहिजे. दारं उघडायला पाहिजेत. साखळदंड झुगारून द्यायला पाहिजेत. आहे तुमची तयारी? कोणते असतात हे साखळदंड? संस्कार परंपरा. आपण यांचे गोडवे गातो. आपली परंपरा पुढच्या पिढीनं चालवावी असंच प्रत्येक पिढीला वाटत असतं. तुमची बापपिढी तर तुमच्यावर परंपरा लादतच असते. त्यातलं काय घेण्यासारखं असतं आणि काय सोडण्यासारखं याचा तुम्ही कधी विचार करता का? नाही. मग तो या क्षणापासून करायला लागा. बुध्दीवादी पध्दतीनं परंपरांकडे बघा. त्यातले योग्य वाटतील पटतील ते घ्या. बाकीच्या फेकून द्या. बघा किती मुक्त वाटेल तुम्हाला. सुखाच्या वाटेवरून चालायचे असेल तर परंपरा झुगारून द्यायचं पाप तुम्हाला करावेच लागेल. पाप त्यांच्यादॄष्टीने असतं. आपल्यासाठी ते पुण्यकर्म ठरतं.'' ती योगेश सोबत लग्न करते चार वर्षात घटस्फोटही घेते.
अशा प्रकारे परमचा प्राध्यापक ते अध्यात्मिक गुरूपर्यंतचा प्रवास या चार व्यक्तीरेखांच्या कथनातून स्पष्ट होत जातो. चारी पात्रांच्या समस्या वेगवेगळया आहेत. ही चारही पात्रे वेगवेगळया कुटंबातील, वेगवेगळया सामाजिक, मानसिक परिस्थितीत वाढलेली आणि वेगवेगळया समस्या असलेली आहेत. वर्तमान काळात आपण पाहतो बुवाबाजीचे प्रस्थ वाढत आहे. त्या अनुषंगाने ही कादंबरी महत्वाची ठरते. अध्यात्माच्या नावाखाली गुरू बाबांचे वाढते प्रस्थ आणि लोकांची एका अर्थानं फसवणूक हे समाजातील वास्तव कादंबरी अधोरेखित करते. प्रारंभीच 'गुरूजींची हत्या का झाली' ही गोष्ट कादंबरीमध्ये कुतूहल वाढवून ठेवते. कम्यून, तिथली शिस्त, तसेच तिथले लहान-सहान संदर्भ, बारकार्इने केलेले गहन मनोविश्लेषणामुळे वाचक वाचताना गुंग होतो. सदर कादंबरीत मानसशास्त्र, तत्वज्ञान, सामजशास्त्र .मधील खूप सारे संदर्भ आलेले आहेत. लेखिकेच्या व्यापक जीवनानुभव, अफाट वाचन, चिंतन, मननाचा परिचय देणारी ही कादंबरी वाचकास समॄध्द करते.पूर्वदीप्ती शैलीचा (Flashback) वापर केला गेला आहे. प्रत्येक पात्रास प्रारंभी परमच्या मॄत्यूची बातमी कळते आणि मग त्यांच्यासमोर त्यांचा भूतकाळ येतो. मग प्रत्येक पात्र भूतकाळातील परमबरोबरची आपली कथा सांगतात त्यातून परमची व्यक्तिरेखा उलगडली जाते. कादंबरीमध्ये फ्रार्इडने सांगितलेल्या कामप्रेरणेचा मानवी जीवनावर होणारा परिणाम अत्यंत कलात्मकतेनं वास्तवादी पात्रांच्या माध्यमातून अभिव्यक्त झाला आहे. कादंबरीत लैंगिकतेसंदर्भात ही पात्र आपल्या जीवनाविषयी स्वत: बोलतात. पात्रमुखी निवेदन पध्दतीचा वापर केला गेल्याने कादंबरी वाचकाच्या मनावर पकड घेते. कादंबरीस साजेसं मुखपृष्ठ राजेंद्र गिरधारी  यांनी तयार केलेले आहे. एकंदरीत अध्यात्मिक चिंतन, जीवनविषयक खोल अनुभव, अनेक पुस्तकांचे संदर्भ, नातेसंबंधांचे मार्मिक विश्लेषण, पात्रांचे मनोविश्लेषण, पात्रानुकूल भाषा, शब्द निवड, मानसशास्त्रीय संकल्पना असा विस्तॄत पट असलेली ही कादंबरी वाचकाला प्रभावित तर करतेच पण त्याचवेळी कामप्रेरणेकडे बघण्याची नवी दॄष्टी देते.
-प्रा .एस .के .आतार 


पुस्तकाचे नांव : देहाचिये गुंती
लेखिका : डॉ. अंजली सोमण
प्रकाशक: कॉन्टिनेन्टल प्रकाशन, पुणे
पॄष्ठे : 436
किंमत: 400

                    

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