भारत की पुरुष प्रधान संस्कृति में स्त्रियों को दोयम स्थान दिया जाता रहा है, उसे उपेक्षित रखा जाता रहा है। तो भारतीय साहित्य में ऐसी उपेक्षित स्त्रियों की वेदनाओं, पीड़ाओं तथा उनकी भावनाओं को मानवता की दृष्टी से देखकर अभिव्यक्त करने की कोशिश भी होती रही है। लेकिन फिर भी नारी जीवन के कुछ अनछुए पहलू लेखकों की लेखनी से शब्दबध्द नहीं हुएं है। ऐसे अनछुए पहलू की दास्तान है ‘इब्नेबतूती’ उपन्यास। यह उपन्यास नई हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक दिव्य प्रकाश दुबे जी ने लिखा है और जिसका प्रकाशन हिंद युग्म द्वारा जुलाई, 2020 में हुआ है। इस उपन्यास में प्रमुख पात्र के रूप में शालू अवस्थी है। जो एक आत्मनिर्भर नारी है और कृषि विभाग में एडिशनल डायरेक्टर के पद पर कार्यरत है। अपने पति की असामयिक मृत्यु के उपरांत भी न हारते हुए अपने बेटे को लेकर बड़े स्वाभिमान से, प्रामाणिकता से मातृत्व का निर्वहन करते हुए रहने वाली एक आदर्श भारतीय नारी है। उसे एक राघव नामक लड़का है, जो कॉलेज की पढ़ाई कर रहा है। डाटा साइंस में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के लिए वह विदेश जाना चाहता है। उसका चयन भी होता है लेकिन उसके सामने दिक्कत यह है कि वह अपनी मां अर्थात शालू को अकेली छोड़कर जाना उसे ठीक नहीं लगता । इसलिए वह चिंतित है। उसकी एक गर्लफ्रेंड है जिसका नाम निशा है।
घर में अलमारी के ऊपर रखा हुआ पुराना संदूक है। उस पुराने संदूक को खोलने की परमिशन किसी को भी नहीं थी। क्योंकि शालू ने बचपन से ही बेटे राघव को बताया था कि उस संदूक को हाथ न लगाए, ना ही वह खोल कर देखें। क्योंकि उसमें उसके पापा के हॉस्पिटल के कागजात है। इसीलिए राघव के मन में उस संदूक को लेकर एक जिज्ञासा भी थी। लेकिन मां ने दी हुई सूचना के कारण वह उस संदूक को ना कभी हाथ लगाता या न ही खोलता था । राघव की गर्लफ्रेंड निशा एक दिन उस संदूक को खोलकर उसमें की चिट्ठियां पढ़ लेती हैं। फिर राघव और निशा के बीच उन चिट्ठियों को लेकर चर्चा होती है। उन चिट्ठियों से उनको यह पता चलता है कि कुमार आलोक नामक कोई व्यक्ति है, जिसको संबोधित करके चिट्ठियां लिखी गई है। फिर वह दोनों शालू को इस बारे में पूछते हैं। शालू का अतीत जानने की कोशिश करते हैं। प्रारंभ में शालू यह बताती नहीं। लेकिन धीरे-धीरे अपने पुत्र हट्ट के कारण वह उसे कुमार आलोक के बारे में बताती है। राघव और निशा शालू की अपनी भावनाओं, विचारों को व्यक्त करने के लिए किसी पार्टनर की, किसी फ्रेंड की जरूरत को महसूस करते हैं और उसे दूसरी शादी या फ्रेंड करने की सलाह देते हैं,उनसे चर्चा करते हैं। प्रारंभ में शालू मानती नहीं है। लेकिन बाद में वह मानती है। निशा शालू के लिए मेट्रोमोनी में एक विज्ञापन देती है। और फिर मेट्रोमोनी के माध्यम से एक प्रोफेसर शालू को मिलते हैं। दोनों में चर्चा होती है। दोनों में फ्रेंडशिप भी हो जाती है। लेकिन तब तक शालू ने कुमार आलोक के बारे में बेटे राघव और निशा को इतिहास बताती है। फिर राघव कुमार आलोक को ढूंढने की कोशिश करता है। गूगल पर सर्च करता है। और फिर उसके हाथ एक पता लगता है वह अपनी मां को लेकर उस पते पर जाता है। लेकिन वहां पर जिस कुमार आलोक को ढूंढ रहे थे वे कुमार आलोक ना होकर दूसरे कुमार आलोक निकलते है। फिर भी राघव कुमार आलोक को ढूंढता ही रहता है। राघव की कुमार आलोक की खोज शुरू रहती है और फिर वह शालू को लेकर बोधगया में जाता है। वहां उनको कुमार आलोक के व्रुद्ध पिता मिलते है। लेकिन वे भी कहते हैं कि कुमार आलोक से हमारा झगड़ा हो गया है, वह हम पर नाराज है। वह गांव में आता नहीं है। उनसे एक मोबाइल नंबर मिलता है, जो पुत्तन भैया नामक व्यक्ति का है, जो कुमार आलोक का दोस्त है । फिर उस नंबर को राघव कॉल करता हैं, वहां अपनी मां को लेकर जाता हैं लेकिन वहां पर भी उनकी भेंट, मुलाकात नहीं होती है। नाराज होकर अपनी मां को लेकर घर आता है। और अंत में दिल्ली को एयरपोर्ट जाने के लिए निकलता है। उसे छोडने के लिये शालू, निशा और प्रोफेसर साथ में आते है वे दोनो जब पुत्तन भैया के वहा एक रात रहे थे, तब उसी रात शालू ने एक चिठ्ठी लिख कर वहा रखी थी। वह कुमार आलोक के हाथ लगती है। फिर अंत में कुमार आलोक और शालू की एयरपोर्ट पर भेंट होती है और उपन्यास की कथावस्तु यहां समाप्त होता है।
उपन्यास के प्रारंभ में ही ‘इब्नेबतूती’ इस शब्द का मतलब देते हुए लेखक ने लिखा है "अधूरी चीजों, चिट्ठियों, बातों, मुलाकातों, भावनाओं, विचारों, लोगों के नाम एक नया शब्द गढना पड़ा -इब्नबतूती"। उपन्यास के प्रारंभ में समर्पण की जो पंक्ति है- 'मां जो कभी एक 20 बरस की लड़की थी उस लड़की के नाम' यह पढ़कर पाठक उपन्यास की कथावस्तु का अनुमान लगाता है कि शायद यह उपन्यास मां और उसकी अपनी अतीत के दुनिया पर आधारित उपन्यास है।
उपन्यास में छोटे-छोटे 33 भाग है। हर एक भाग को शीर्षक दिए गए हैं। जैसे- अक्टूबर 2015, 3 महीने पहले, अम्मा यार, रुमाल, संदूक, 7 अगस्त 1990, फौजी दा ढाबा आदि। जिसके कारण पाठक को कथावस्तु समझने में मदद हुई है। इन कुछ भागों के पहले कुमार आलोक या शालू की चिट्ठीयों को प्रस्तुत किया गया है। जिसमें तरल भावनाएं है तथा अनूठी विचार भी है। जैसे "पूरी दुनिया में एक भी डॉक्टर ऐसा नहीं है, जो दवा के साथ दिन में दो बार प्रेम पत्र लिखने के लिए कहे। सब बीमारियां केवल दवा से कहा ठीक होती है !" (पृष्ठ 44) उपन्यास में बीच-बीच में कुछ ऐसे उद्धरण है, वाक्य है जो हमें सोचने के लिए बाध्य करते हैं। जैसे "अक्सर होता है न कि जहां के लिए हम चले थे वहां पहुंचते ही याद आता है कि पहुंचने की वजह खो चुकी है"(पृष्ठ 16) इसके साथ-साथ उपन्यास में कृषि विभाग के दफ्तर की कार्यशैली तथा वहां के कुछ यादव जैसे अफसरों की, कर्मचारी लोगों की स्त्रियों तरफ देखने की प्रवृत्ति का चित्रण भी हुआ है। इन प्रवृत्तियों के संदर्भ में लेखक लिखते है कि “वैसे भी लड़कियां और औरतें अपने आसपास एक लाइन खींच कर चलती है। उनको खूब समझ में आता है कि कौन लाइन क्रॉस कर रहा है और उसको ठीक कैसे करना है"(पृष्ठ 24) लेखक की जीवनानुभव, चिंतन सहजता से व्यक्त करने की शैली विशेष है। वह कहते है, “सूखी हुई नदी की एक बहती हुई नदी की असली कहानी जानती है " (पृष्ठ 35) और एक उदाहरण हम देख सकते है "आदमी सबसे जरूरी बात सबसे पहले भूल जाता है सांस लेना सबसे जरूरी आदत है और हमें दिन में एक बार भी ख्याल भी नहीं आता कि हम सांस ले भी रहे हैं या नहीं मां का प्यार एक अदना सी सांस जैसा ही होता है"(पृष्ठ 67) इस प्रकार ऐसे अनेक वाक्य हमें नई दृष्टि देते हैं।
यह उपन्यास एक नारी के अतीत में जो भी घटनाएं घटित हुई होती है उनको अभिव्यक्त करता है। पाठकों में प्रारंभ मी बनी जिज्ञासा,रोचकता अंत तक बनी रहती है। पाठक उपन्यास में तल्लीन हो जाता है। राघव अपना 'पुरूषी इगो' छोड़कर अपनी मां की अतीत की ओर मानवता की दृष्टि से, व्यापकता से देखता है। उसकी मानसिकता को समझने की कोशिश करता है। यह बात बहुत महत्वपूर्ण है। उपन्यास में मंडल कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद की परिस्थिति को प्रस्तुत किया गया है। अंत में उसके संदर्भ भी दिये हुए हैं।पात्रानुकूल भाषा का प्रयोग हुआ है। बीसवीं सदी के अंतिम दशक से लेकर 2015 तक की परिस्थिति का चित्रण प्रमुखता से इसमें हुआ है। अंग्रेजी शब्दों का भी बीच-बीच में इस्तेमाल हो चुका है। उपन्यास के अंत में लेखक ने पाठकों से कुछ सवाल किए हैं जो अहम है। जिससे पाठक चिंतन करने बाध्य होता है। आज भी हमारे भारत में अनेक 'शालू अवस्थी' मौजूद है जो अपने दर्द को लेकर कराह रही है। इस प्रकार नारी के ऐसे अनदेखे एवं महत्वपूर्ण पहलु को लेकर, विषय को लेकर लिखा गया यह उपन्यास अपने आप में अनूठा है और महत्वपूर्ण भी। भारतीय नारी के भीतर छिपी औरत को टटोलने का यह प्रयास प्रामाणिक भी है और प्रशंसनीय भी।
-प्रा.एस.के.आतार
पुस्तक: इब्नेबतूती( उपन्यास)
लेखक: दिव्या प्रकाश दुबे
प्रकाशक हिंद युग्म
मूल्य: ₹150
पृष्ठ संख्या: 160
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